संदेश

अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मधुरता

एक पथिक ने नदी से पूछा- हे  सरिता ! तुम इतनी छोटी हो ,फिर भी तुम्हारा जल कितना मधुर है और सब की प्यास बुझाने वाला है । उधर देखो सागर कितना विशाल है! फिर भी उसका जल खारा है।  ऐसा क्यों?  नदी बोली इसका उत्तर तो आप सागर से ही जाकर पूछो । अब जब पथिक सागर के पास गया और सागर से प्रश्न किया तो सागर ने क्या उत्तर दिया -  नदी एक हाथ से लेती है और दूसरे हाथ से आगे बढ़ा देती है । दूसरों को देने के लिए ही दिन- रात दौड़ती रहती है , इसलिए ही उस का जल मधुर है जबकि मैं सबसे केवल लेता ही रहता हूँ अतः मेरा जल खारा है।  पथिक समझ गया कि देने वाले के जीवन में मधुरता होती है और संग्रह करने वाले के जीवन में नीरसता।

पुण्यात्मा का महत्व

आपके घर में जब तक कोई पुण्य शाली व्यक्ति रहता है, तब तक आपके घर में कोई नुकसान नहीं कर सकता................        जब तक विभीषणजी लंका में रहते थे , तब तक रावण ने कितना भी पाप किया, परंतु विभीषणजी के पुण्य के कारण रावण सुखी रहा। परंतु जब विभीषण जी जैसे भगवत  वत्सल भक्त को लात मारी और  लंका से निकल जाने के लिए कहा, तब से रावण का विनाश होना शुरू हो गया।             अंत में रावण की सोने  की  लंका का  दहन हो गया और रावण के पीछे कोई रोने वाला भी नहीं बचा। ठीक इसी तरह हस्तिनापुर में जब तक विदुरजी जैसे भक्त रहते थे , तब तक कौरवों को सुख ही सुख मिला।       परंतु जैसे ही कौरवों ने विदुरजी का अपमान करके राज्यसभा से चले जाने के लिए कहा और विदुर जी का अपमान किया, तब भगवान श्री कृष्ण जी ने विदुरजी से कहा कि.."काका आप अभी तीर्थ यात्रा के लिए प्रस्थान करिए और भगवान के तीर्थ स्थानों पर यात्रा कीजिए।"                 और भगवान श्री कृष्णजी ने विदुरजी को तीर्थ यात्रा के लिए भेज...

गायत्री मंत्र

 ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात्।। सत्, चित्, आनंदस्वरूप और जगत् के स्रष्टा ईश्वर के सर्वोत्कृष्ट तेज का हम ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को शुभ प्रेरणा दें। (यजुर्वेद ३६।३)

पंडित प्रताप नारायण मिश्र

 साहित्य मनीषी पंडित प्रताप नारायण मिश्र अपनी रचनाओं के माध्यम से सत्य, अहिंसा ईमानदारी आदि पर प्रकाश प्रकाश डाला करते थे | वे प्राय: कहा करते थे की असली साहित्य में है जिससे पाठकों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिले| एक बार भी कालाकांकर रियासत के जंगल में भ्रमण कर रहे थे । युवा लेखक गोपाल राम गहमरी उनके साथ थे। अचानक उन्होंने गहमरी जी से कहा-" वत्स मेरे पास एक अनमोल वस्तु है उसे मुझे एक पहुँँचे हुए सिद्ध महात्मा ने आशीर्वाद -प्रसाद के रूप में दिया है । मैंने उससे बहुत कुछ पा लिया है, अब मैं उसे किसी योग्य युवक को देना चाहता हूँ। कोई ऐसा योग्य पात्र मिल नहीं रहा है। गहमरी ने उनके शब्द सुने तो जिज्ञासा जागृत हुई कि ऐसी अनमोल वस्तु क्या है, इनके पास ? वे बोले -'क्या मैं उसे लेने योग्य नहीं लगता?' मिश्र जी ने थैले में से पीपल का एक पत्ता निकाला । उस पर लाल रोली से अंकित था-' सत्य से बढ़कर दूसरा कोई गुण नहीं है।' वे उसे गहमरी जी से देते हुए बोले -'सवेरे जब सो कर उठो, इसे देख लिया करो। सत्य- संभाषण, सत्याचरण का अभ्यास हो जाएगा । सत्य संभाषण से तुम्हारी आत्मा ही न...

सत्य

 एक दिन छाया ने मनुष्य से कहा, ' लो देखो, तुम जितने थे, उतने ही रहे और मैं तुमसे क ई गुना बढ़ गई।' यह सुनकर मनुष्य मुसकराया और बोला, ' सत्य और असत्य में यही तो अंतर है । सत्य जितना है, उतना ही रहता है, जबकि असत्य पल-पल में घटता-बढ़ता रहता है।'