स्व की पहचान

हमें परम सत्य का अंश मात्र भी समझ सिर्फ तभी आएगा जब हमारी इंद्रियों का भोग समाप्त हो जाएगा। इंद्रियों के वशीभूत रहते हुए सत्य की कल्पना निराधार सी हो जाती है। इंद्रियों से तात्पर्य पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ व छठा मन।

समस्त योनियों में मनुष्य योनि श्रेष्ठ है। क्योंकि इसमें भोग के साथ योग भी हो सकता है। और जन्म हुआ है तो भोगना तो है ही। भोगना हैः
 कष्ट, आनंद, दुख, सुख, साधन, प्रेम, राग, क्रोध, क्षोभ, शौर्य, दया, अहम, भ्रम,समृद्धि, ऐश्वर्य, गरीबी सब कुछ भोगना है। इंद्रियों को ये सब भोगना है। 

किसी को कम किसी को अधिक। किसी को अपने प्रारब्ध को , किसी को अपने वर्तमान को। परंतु भोगना सबको है। सब कुछ जो आप अपने अंतस से निकाल बाह्य जगत को दे रहें हैं। वो सब लौट कर आप में ही समाहित होगा। आप का आज कल से प्रभावित है और कल आज से निर्धारित होगा। जो कल होगा वो कुछ कुछ तय हो चुका है और कुछ कुछ आज तय हो रहा है। जो कल निकल चुका है वो आज वापस आ रहा है और जो आज बन रहा है वो कल फिर वापस आएगा। 

मानव जीवन बाह्य दुनिया को अपनी इंद्रियों से ही देखता है और हमारी इंद्रियाँ ही भोगती हैं। इंद्रियाँ ही हमें उलझाए रखती हैं। इंद्रियाँ अहम बोध कराती हैं।  

 इंद्रियों पर विजय पाना कुछ  उग्र सा प्रतीत होता है क्योंकि इंद्रियों से कोई युद्ध नहीं चल रहा है। इंद्रियों को वश में करना या नियंत्रित करना ही उपाय है। इंद्रियाँ जब तक हैं , तब तक भोगेगी और  जितना भोगेंगे , उतना सत्य से हम दूर जायेंगे।

जो भी सत्य इंद्रियों के दर्शाने से दिखता है वो भ्रम है। परम सत्य इंद्रियों के परे है। इंद्रियों के परे जाने का रास्ता स्व को समाप्त करने से बनता है। सारा युद्ध ही स्वयं से है। जब- जब स्व की अनुभूति होगी , तब -तब अहंकार आएगा। स्व जैसे- जैसे समाप्त होगा इंद्रियाँ शांत होती जायेंगी। शांत इंद्रियों के परे जाने पर ही परम सत्य के समीप जाने का रास्ता दिखेगा।

सत्य एक है, वही परम है और वही सब कुछ है।
असत्य असंख्य हैं , आभासी है और भ्रामक है।

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