मणिमहेश यात्रा
*यात्रा मणिमहेश कैलास*
भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है, 'पर्वतों में मैं हिमालय हूँ।'' यही वजह है कि हिंदू धर्म में हिमालय पर्वत को विशेष स्थान प्राप्त है।वृहत संहिता में तीर्थ का बड़े ही सुंदर शब्दों में वर्णन किया गया है। इसके अनुसार, "ईश्वर वहीं क्रीड़ा करते हैं जहाँ झीलों की गोद में कमल खिलते हों और सूर्य की किरणें उसके पत्तों के बीच से झाँकती हो, जहाँ हंस कमल के फूलों के बीच क्रीड़ा करते हों...जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य की अद्भुत छटा बिखरी पड़ी हो।' हिमालय पर्वत का दृश्य इससे भिन्न नहीं है। पद्मपुराण में मणिकूट कैलास दर्शन का महत्व वर्णित है।जुलाई-अगस्त के दौरान पवित्र मणिमहेश झीलके लिए तीर्थयात्री जाना शुरू हो जाते हैं। यहीं पर 15 दिनों तक मेला जन्माष्टमी के दिन से शुरू होकर राधाष्टमी के दिन समाप्त होता है।
पंच कैलासों की यात्रा का अवसर जीवन में सौभाग्यशाली लोगों को ही मिलता है। मन में कैलास यात्रा का सपना था जो शिव कृपा से ही पूरा हो सकता था। पंच कैलास में से एक मणिमहेश कैलास की यात्रा का विचार माह जून 2023 से कुछ बंधुओं के साथ साझा किया और सितंबर माह की 9 तारीख को 9 लोगों का जन्माष्टमी के बाद भगवत्कृपा से तय हुआ। कुल 9 लोग में से 8 लोग भगवान शंकर के दर्शनार्थ 9 सितंबर सायं 4:05 बजे की ट्रेन से पठानकोट के लिए निकल पडे। आगामी होने वाली थकान को ध्यान में रखते हुए एसी में सफर हुआ। 10सितंबर सुबह 4बजे पठानकोट पहुँच गए। ट्रेन में हनुमानगढ़ से बैठते ही पठानकोट में टैक्सी प्रोवाइडर से संपर्क कर 15000 रुपये में हड़सर तक के आने जाने के लिए इनोवा टैकसी बुक की। पठानकोट से हड़सर की दूरी 192 किमी है पर सारा रास्ता पहाड़ी है।
10 सितंबर - पठानकोट रेलवेस्टेशन पर शौच आदि नित्य कर्म के पश्चात चाय की चुस्कियों का आनंद लेकर लगभग 6 बजे भरमौर की ओर रवानगी ली। सीधा भरमौर जाने का विचार था पर सहयात्री कुछ अन्य स्थान देखने के इच्छुक थे तो बनीखेत से हिमालय की सौंदर्य परी डलहौजी पर्यटक स्थल की ओर टैक्सी मोड़ ली गई। जो बनीखेत से 7किमी है इस स्थान का वर्णन मैं पिछली यात्रा में कर चुका हूँ जो दिसम्बर 2022 में की गई थी। डलहौजी में सुबह की ठंड में सभी को जेकैट पहना दी । वहाँ ज्यादा रुके नहीं केवल टैक्सी ड्राइव का आनंद लिया व कुछ फोटोज प्रकृति के साथ मोबाइल में कैद किए। अब अगले पड़ाव चीड़ और देवदार के ऊंचे-लंबे हरे-भरे पेडों और पहाड़ों के बीच बसे खजियार को भारत का मिनी स्विटजरलैंड कहा जाता है।भारत के मिनी स्विट्जरलैंड खजियार झील पर पहुँच गै। क्या अद्भुत सौंदर्य ? इसका वर्णन भी गत यात्रा में हो चुका है। यहाँ एक से डेढ घंटे रुके व नाश्ता ग्रहण किया। पहाडी कटाव वाले तीखे मोड़ो पर आप जी मिचलाना व उल्टी जैसी दिक्कतों का सामना कर सकते हैं अतः हल्का नाश्ता रोटी व दही लिया गया।
खजियार से चंबा होते हुए रावी नदी के किनारे किनारे हम सायं 4 बजे भरमौर पहुँचे। चंबा से खजियार तक सड़क के एक किनारे रावी तो दूसरी ओर पीर पंजाल शृंखला की ऊँची ऊँची पहाड़ी चोटियाँ हैं। सड़क मार्ग एन एच 154 ए अच्छी स्थिति में है हालांकि बरसात से कहीं कहीं सड़क क्षतिग्रस्त है। मणिमहेश मेले के कारण मार्ग में स्थान स्थान पर श्रद्धालुओं द्वारा लंगर की व्यवस्था की हुई है। दोपहर का भोजन इन्हीं लंगर में किया गया।
भरमौर पहुँच कर सामान होटल में व्यवस्थित किया गया। होटेल की बुकिंग ऑनलाइन दो माह पूर्व ही कर ली गई थी। मणिमहेश के दर्शन से पूर्व माँ ब्रह्माणी के दर्शन की मान्यता है। माँ ब्रह्माणी को स्थानीय भाषा में भरमाणी कहा जाता है। ब्रह्मा या ब्रह्माणी के नाम पर ही यह भरमौर है। भरमौर एक रियासत रही है। तो माँ ब्रह्माणी या भरमाणी का मंदिर भरमौर से 7 किमी दूर है जिसके लिए टैक्सी की सुविधा है। आने जाने का किराया 100 रुपए निर्धारित है। टैक्सी ड्राइवर एक जिंदादिल व हँसमुख नौजवान था जिससे के साथ स्थानीय भाषा में भरमौ, मणिमहेश, माँ भरमाणी, 84 सिद्ध मंदिरों के बारे में तमाम जानकारी मालूम हुई। और पहुँचे माँ भरमाणी के मंदिर में। मंदिर के आगे ही बावडी है जहाँ पवित्र जल प्रवाहित होता है लोग भयंकर ठंड यानी 1 व 2 डिग्री सेल्सियस में स्नान करते हैं। पर श्रद्धा के आगे ठंड भी नहीं ठहरती। माँ भरमाणी के दर्शन किए । आत्मा ईश्वरीय आनंद से अभिभूत हो गई। यहीं लंगर में प्रसाद लिया और उसी टैक्सी से नीचे मरमौर आए। यह रास्ता बेहद सँकड़ा है और ऊपर से अँधेरा घिर चुका था । ऐसे में मेरे सहयात्रियों में से कुछ मन में आशंकित व भयभीत भी थे। अब भरमौर में ही चौरासी मंदिर के दर्शन किए। धर्मराज यमराज का एकमात्र मंदिर यहाँ है व चौरासी सिद्ध लिंग रूप में स्थित हैं।माना जाता है कि भरमौर के राजा सहिल वर्मन ने मंदिर का निर्मान 84 सिद्धकों के नाम पर करवाया था। यह योगीजन कुरुक्षेत्र से आए थे और मणिमहेश झील व मणिमहेश कैलाश पर्वत के दर्शन के लिए जा रहे थे। रास्ते में वे भरमौर में रुके और वहाँ साधना करी। उन्होंने निःसंतान राजा को दस पुत्रों और एक पुत्रि का वरदान दिया। आस्था है कि मणिमहेश झील का तीर्थ इस मंदिर के दर्शन करे बिना पूरा नहीं होता। यह मंदिर शिव और शक्ति को समर्पित है। यहाँ भगवान विष्णु के नृसिंह अवतार की प्रतिमा भी स्थापित है।रात्रि विश्राम से पूर्व कल की यात्रा के लिए पिट्ठू बैग में प्रत्येक यात्री के लिए अलग अलग सामान पैक किया गया व शेष सामान में टैक्सी में ड्राइवर की सुरक्षा में रखा गया। इसके बाद रात्रि विश्राम किया गया।
11सितंबर सोमवार- टैक्सी से भरमौर से 15 किमी दूर हड़सर गाँव गै जहाँ से पैदल यात्रा शुरु करनी थी। प्रातःकालीन नाश्ता प्रसाद हड़सर में लिया और 7:40 बजे यात्रा भगवान शिव की असीम कृपा से प्रारंभ हुई। यात्रा मार्ग बड़ा कठिन है। अनगढ़ पत्थरों का मार्ग व साथ में चढ़ाई जिस पर साँस फूलने की भी दिक्कत रहती है। 4 से 5 फुट चौडा मार्ग पर कहीं कहीं तो एक व्यक्ति ही निकल सकता है । साथ में यात्रियों व सामान ढोने वाले खच्चर भी रहते हैं। मणिमहेश झील की ऊँचाई समुद्र तल से 15000 फीट है। हहड़सर से 13 किमी की पैदल यात्रा से इस झील तक पहुँच सकते हैं।हड़सर से पैदल चढ़ाई करते हुए पहला पड़ाव आता है धनछो। यह रास्ता बहुत कठिन व मुश्किल है। धनछो से आगे, सुंदरासी व शिव घराट होते हुए खड़ी चढाई कर मणिमहेश झील से लगभग डेढ किलोमीटर पहले गौरीकुंड आता है। मैं खड़ी चढाई में पूरी तरह थक चुका था तो गौरीकुण्ड से 2 किमी पहले 450 रुपये में खच्चर तय कर गौरीकुण्ड तक की यात्रा खच्चर से की। शेष सहयात्री पैदल ही चलकर पहुँचे। अब यहाँ टैंट में ठहरना था और तापमान भी 0 डिग्री सेल्सियस होने वाला था तो थर्मोकोट ऊपर व नीचे के इनर वस्त्र, ओवरकोट जैकेट आदि पहन लिए गै। टैंट में प्रति व्यक्ति 100 रुपये निर्धारित किराया है।
12 सितंबर - प्रातः ढाई बजे ही टैंट वाले से चाय बनवा कर पी ली। नित्य कर्म से निवृत्त हुए और मणिमहेश झील श्रद्धालुओं के लिए यही अंतिम स्थान है वहाँ के लिए साढे चार बजे प्रस्थान किया। मणिमहेश की डल झील शिव भगवान की स्नान स्थली है।सदियों से चल रही इस यात्रा को तभी सफल माना जाता है, जब यहाँ रात्रि व्यतीत कर भोर होते ही कैलाश पर्वत के दर्शन कर वहां कुदरती तौर पर उत्पन्न होने वाले दिव्य प्रकाश में झील में स्नान किया जाए। तीर्थयात्री झील की परिक्रमा भी करते हैं।मणिमहेश पर्वत के शिखर पर भोर में एक प्रकाश उभरता है, जो तेजी से पर्वत की गोद में बनी झील में प्रवेश कर जाता है। यह इस बात का प्रतीक माना जाता है कि भगवान शंकर कैलाश पर्वत पर बने आसन पर विराजमान होने आ गए हैं तथा ये अलौकिक प्रकाश उनके गले में पहने शेषनाग की मणि का है। भोर के समय चंद्रमा व शुक्र तारे की कैलास पर अद्भुत स्थिति बनती है। चंद्रमा भगवान शिव के माथे पर विराजमान होताहै व शुक्र मणि रूप प्रकाश फैलाता है। जो बहुत रोमांचित है। प्रातः 4 बजे से सूर्योदय होने तक का दृश्य आत्मा को आनंदविभोर कर देने वाला है। जो अनिर्वचनीय है।
सहयात्रियों ने झील में स्नान किया व मैंने हाथ, पैर मुँह प्रक्षालन कर भगवान शिव की पूजा अर्चना की। स्वर्गीय आनंद की अनुभूति को कैसे वर्णित करें। अब हम हड़सर के लिए रवाना हुए अब मार्ग पूरा उतराई का था। पूरे मार्ग में लंगर व ठहरने की व्यवस्था है। मार्ग की कठिनता को देखते हुए श्रद्धालु यह यात्रा 4 से 5 दिन में पूर्ण करते हैं। जब हम नीचे पहुँचे तो पैर पूरी तरह जवाब दे चुके थे। लेकिन कैलास दर्शन आनंद दे रहा था। रात्रि विश्राम भरमौर में किया।
13 सितंबर- प्रातः भरमौर से ही नाश्ता कर टैक्सी से पठानकोट के लिए प्रस्थान किया। पठानकोट से ही हनुमानगढ़ के लिए ट्रेन थी जिसमें एसी-3की बुकिंग हो चुकी थी। इस यात्रा में सहयात्री के रूप में अनुज सुनील, गंगानगर से श्री सुरेंद्र खिलेरी, चंडीगढ़ से नोहर निवासी श्री मनोज शर्मा, बेटा गौरव , श्री मनमोहन शर्मा, श्री उदयवीर, श्री शौकत अली साथ रहे। भगवान भोलेनाथ की कृपा हर क्षण हर पल सभी पर बनी रही ।
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